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छापों की सियासत में छिपा सच

देश में केंद्रीय संस्थाओं द्वारा मारे जाने वाले छापे अब जेम्सबांड के उपन्यासों का कथानक बनते जा रहे हैं .हाल ही में उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश में दो बड़े संस्थानों में मारे गए छापों की टाइमिंग ने इन छापों को लेकर सरकार की नीयत पर शक करना शुरू कर दिया है. इन छापों के बाद क्या होता है, कोई नहीं जानता. क्योंकि छापों के बाद बात आई-गयी हो जाती है.

उत्तर प्रदेश में इत्र व्यापारी पियूष जैन के यहां मारे गए संयुक्त छापों में बीते साल के मारे गए छापों में सबसे ज्यादा नगदी बरामद की गयी है. जैन व्यापारी है और सियासत हर व्यापार की बैशाखी इसलिए ये कहना कठिन है की इत्र की कमाई से पीयूष जैन किस राजनीतिक दल की कितनी सेवा करता था. सत्तारूढ़ भाजपा जैन को समाजवादी पार्टी का आदमी बताती है जबकि समाजवादी पार्टी जैन को भाजपा का आदमी बताती है. जैन किसका आदमी है ये शायद अब जैन को भी पता नहीं होगा.

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि इस देश में खून-पसीना बहाकर कोई भी उद्यमी करोड़पति नहीं बना.अधिकाँश की पृष्ठभूमि ऐसी है कि जिसमें तमाम साम्य होते हैं. मसलन कि अधिकांश जमीन से जुड़े हुए बताये जाते हैं और फिर वे अपने पुरषार्थ से अरबों, खरबों के मालिक बन जाते हैं, करोड़पति बनना तो बेहद आसान काम है. पीयूष जैन भी हर तरह के करों की चोरी कर ही अपनी हैसियत बना पाए होंगे. इसके लिए पीयूष जैन नहीं हमारी कर प्रणाली है जिसमें कर चोरी की असंख्य गलियां पहले से बनाई जा चुकी हैं. देश में जिन-जिन महापुरुषों के आयकर या प्रवर्तन विभाग के छापे डाले गए उनमने से शायद ही कोई जेल के सींखचों के पीछे गया हो गया भी होगा तो आनन-फानन में जमानत पर रिहा हो गया होगा.

उत्तर प्रदेश के बाद मध्यप्रदेश में बीते दो दशक में पांच हजार करोड़ के आसामी बने दिलीप बिल्डकॉन पर भी छापे मारे गए, हालांकि मध्यप्रदेश में अभी चुनाव दूर हैं. दिलीप बिल्डकॉन कैसे बनी मध्यप्रदेश का बच्चा जानता है. प्रदेश में पुरानी डेढ़ दशक की सरकारों के मुखियाओं कि इस कम्पनी पर जितनी मेहरबानी हुई उतनी किसी पर नहीं हुई, लेकिन अचानक ये कमपनी भी छापों की जड़ में आ गयी. कहा जाता है कि एनएच आई के एक वरिष्ठ पदाधिकारी को बीस लाख की रिश्वत पेश करने के बाद ये छापामारी की गयी.

देश में पीयूष जैन और दिलीप बिल्डकॉन जैसी हजारों संस्थाएं और व्यक्ति हैं जिनकी प्रगति देश के लिए गर्व का विषय हो सकती है. ये लोग और उनकी कंपनियां हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत की तरह अघोषित रूप से राज्याश्रित होती हैं. राज्य यानि सरकार के संरक्षण के बिना इन संस्थाओं और व्यक्तियों का कल्याण हो ही नहीं सकता. आप दूसरे शब्दों में इन संस्थाओं और ऐसे व्यक्तियों को पालतू और दुधारू गाय-भैंस भी कह सकते हैं. ये नियमित दूध देने के साथ ही चुनाव जैसे उतस्वों के दौरान अतिरिक्त दाना खाती हैं और अतिरिक्त दूध भी देती हैं,यदि ऐसा करने में आनाकानी करतीं हैं तो इन्हें ज्यादा दूध देने वाले इंजेक्शन भी लगाए जाते हैं.

सवाल ये है कि छापे उसी समय क्यों मारे जाते हैं जब देश में चुनावी मौसम होता है ? चुनावों का छापों से क्या रिश्ता है ये जानने का अधिकार देश के हर नागरिक को है कर चोरी राष्ट्रीय अपराध है लेकिन सरकार ऐसा मानती होती तो कर चोरों को आर्थिक जुर्माना करके ससम्मान रिहा न कर देती ? गला पकड़ना और गला दबाकर फिर ढील देना चौथ वसूली का घिसा-पिटा फार्मूला है. जो भी पार्टी सत्ता में आती है वो इसी तरह से करचोरों को पहले राज्याश्रय देती है और बाद में जब जरूरत होती है उनका भयादोहन कर लेती है. सरकार छापे मारने में बड़ी बेरहम भी है और उदार भी.
यदि किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ कार्रवाई करना जरूरी होता तो फिर चुनाव का मौसम ही छापों का मौसम क्यों बनता. बहरहाल चाहे इत्र बनाने वाला हो या सड़क बनाने वाला या खबरदार करने वाला कोई अखबार हो सब छापे के शिकार बनाये जाते हैं .केंद्रीय एजेंसियां सरकार के इशारे पर अपने राजनीतिक विरोधियों और चन्दा प्रदाताओं के यहां छापेबाजी की जाती है कोई नहीं जानता. सरकार कि ये सूची घटती बढ़ती रहती है.

आपको याद होगा कि पिछले साल गुजरात के बलसाड़ जिले के वापी, सरीगाम (वलसाड जिले), सिलवासा और मुंबई में स्थित 20 से ज्यादा परिसरों पर 18 नवंबर को की गई छापामारी में में आयकर विभाग ने रसायनों का निर्माण और रियल एस्टेट का काम करने वाली गुजरात की एक कंपनी पर छापेमारी के बाद 100 करोड़ रुपये की बेहिसाबी आय का पता लगाया था. लेकिन सभी केंद्रीय विभाग तभी काम करते हैं जब सरकार इनसे कहती है.

सरकार न कहे तो कहीं कोई छापा न पड़े, लेकिन यदि छापे न पड़ें तो सरकारें कैसे चलें ? पिछले साल ही दैनिक भास्कर समूह पार 700 करोड़ रूपये की टैक्सचोरी पकड़ी गयी थी, बावजूद इसके किसी का कुछ नहीं बिगड़ा. बिगड़ भी नहीं सकता, क्योंकि यदि सरकार कर चोरों से बिगाड़ करने लगे तो फिर चलेगी कैसे ?

पिछले साल सीबीडीटी और सीबीआइसी के बीच एक समझौता किया गया था और दावा किया गया था कि दोनों विभाग मिलकर कुछ ऐसा करेंगे कि एक भी करचोर बच नहीं पाएंगे, लेकिन इस समझौते से कुछ नहीं हुआ.  कर चोरी जारी है. छापामारी भी जारी है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 130 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश में केवल 1.5 करोड़ लोग इनकम टैक्स देते हैं.

अगर कुल आबादी से इसकी तुलना की जाए तो इनकम टैक्स देने वालों की संख्या देश में सिर्फ एक फीसदी से थोड़ी अधिक है. वहीं 20 साल से अधिक उम्र के आयकर दाताओं की तुलना करें तो केवल 1.6 फीसदी लोग ही इनकम टैक्स देते हैं.

अब जब कुल डेढ़ करोड़ लोग ही टैक्स देंगे तो टैक्स की की होगी ही. टैक्स चोरी नहीं होगी तो देश आगे कैसे बढ़ेगा, राज्य और केंद्र की सरकारें चलेंगी कैसे ? कुल जमा बात ये है कि केंद्र सरकार अपने कर चोरी पकड़ने वाले विशाल बूटों को किसी की पूँछ पर रखकर उन्हें बलि का बकरा बना देती है. करचोर की पूँछ पर पैर रखकर अपना उल्लू सीधा कर लेती है. सरकार का पैर देश के अनेक प्रतिपक्षी दलों के नेताओं की पूंछ पर है. वे तिलमिला रहे हैं माया मेम से लेकर अनेक हैं इस फेहरिश्त में. हालात कब सुधरेंगे कहा नहीं जा सकता.
@ राकेश अचल

 

 

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