शोध में नैतिकता वैज्ञानिक शोध की कसौटी है : डॉ. नितिन गायकवाड़
रायपुर। शासकीय नागार्जुन स्नातकोत्तर विज्ञान महाविद्यालय रायपुर की ‘नैतिक एवं अनुसंधान समिति’ “मानव और पशु संबंधी अनुसंधान में नैतिक मुद्दे” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला का उद्देश्य संकाय सदस्यों, शोधकर्ताओं और छात्रों के बीच अनुसंधान में नैतिक मानकों और जिम्मेदार आचरण के प्रति जागरूकता पैदा करना था।
कार्यशाला की शुरुआत में महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. अमिताभ बैनर्जी ने वैज्ञानिक शोध के विस्तृत फलक पर बात करते हुए नैतिक मूल्यों की महत्ता पर जोर दिया।उन्होंने शोध में नैतिकता को वैज्ञानिक शोध की कसौटी कहा।
एम्स रायपुर के फार्माकोलॉजी विभाग के विशेषज्ञ वक्ताओं ने अनुसंधान में नैतिक विचारों की प्रासंगिकता और महत्व को उजागर करते हुए ज्ञानवर्धक व्याख्यान दिए।
डॉ. नितिन गायकवाड़ ने संस्थानों में नैतिकता समितियों की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि विज्ञान को आगे बढ़ते रहना चाहिए, लेकिन प्रगति नैतिकता की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। उन्होंने नैतिक अनुमोदन की आवश्यकता पर विस्तार से बताया और किसी भी शोध अध्ययन में प्रतिभागियों से सूचित सहमति प्राप्त करने के महत्व पर बल दिया।
डॉ. योगेंद्र एन. केचे ने विभिन्न डेटा अधिग्रहण उपकरणों पर चर्चा की और सटीक और नैतिक डेटा संग्रह सुनिश्चित करने के लिए केस रिपोर्ट फॉर्म (सीआरएफ) और प्रश्नावली के उचित डिजाइन की व्याख्या करते हुए अनुसंधान में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग में उभरते नैतिक मुद्दों की बात कही।
डॉ. डी. पुगाझेंथन ने नैदानिक परीक्षणों के विभिन्न अध्ययन डिजाइनों और चरणों के बारे में बताया। उन्होंने समझाया कि नैदानिक अनुसंधान का उद्देश्य न केवल वैज्ञानिक प्रगति है, बल्कि स्वास्थ्य देखभाल प्रणालियों की दक्षता और समग्र कल्याण में सुधार करना भी है।
अगले सत्र में डॉ. तुषार जगजापे ने जैव सामग्री और बायोबैंकिंग से संबंधित अनुसंधान में नैतिक मुद्दों पर व्याख्यान दिया, जिसमें विनियामक और सहमति संबंधी चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया। डॉ. आशीष खोबरागड़े ने जैव चिकित्सा अपशिष्ट प्रबंधन और इसके नैतिक और पर्यावरणीय प्रभावों पर एक ज्ञानवर्धक सत्र प्रस्तुत किया।
कार्यशाला में कार्यक्रम संयोजक डॉ. वर्षा करंजगांवकर सहित डॉ. सविता सिंह, डॉ. सुनीता पात्रा, डॉ. सुलोचना हबलानी संकाय सदस्यों और विभिन्न महाविद्यालयों के शोधार्थियों ने सक्रिय प्रतिभागिता दर्ज की।
कार्यशाला का समापन एक सार्थक चर्चा सत्र के साथ हुआ, जिसमें प्रतिभागियों ने मानव और पशुओं से जुड़े अनुसंधान के सभी पहलुओं में नैतिक मूल्यों को बनाए रखने के महत्व पर बल दिया गया।





