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Harish Rana Death : 13 साल से कोमा में रहे हरीश राणा का निधन, सुप्रीम कोर्ट से मिली थी इच्छामृत्यु की अनुमति

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नई दिल्ली। गाजियाबाद के हरीश राणा का मंगलवार को दिल्ली स्थित एम्स अस्पताल में निधन हो गया। वह पिछले 13 वर्षों से कोमा में थे और हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उन्हें इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की अनुमति दी गई थी। उनका इलाज अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के इंस्टीट्यूट रोटरी कैंसर अस्पताल (आईआरसीएच) में चल रहा था।

अस्पताल सूत्रों के अनुसार, हरीश राणा को उपशामक देखभाल वार्ड में रखा गया था, जहां पिछले एक सप्ताह से उनकी लगातार निगरानी की जा रही थी। इच्छामृत्यु की प्रक्रिया के तहत उन्हें भोजन और पानी देना बंद कर दिया गया था, जो करीब छह दिनों तक चला। इस दौरान उनकी स्थिति लगातार नाजुक बनी रही और अंततः उनका निधन हो गया।

मां की भावुक अपील

हरीश के अंतिम समय में उनकी मां अस्पताल के गलियारे में बैठकर प्रार्थना करती रहीं। उन्होंने भावुक होकर कहा था कि उनका बेटा अभी सांस ले रहा है और उसकी धड़कन चल रही है। बेटे को खोने से पहले मां ने गहरे दुख के साथ अपनी भावनाएं व्यक्त कीं।

इच्छामृत्यु की कानूनी प्रक्रिया

हरीश राणा के मामले में इच्छामृत्यु की अनुमति एक लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद मिली। इससे पहले परिवार ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसे जुलाई 2025 में खारिज कर दिया गया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां 11 मार्च 2026 को पैसिव यूथेनेशिया की अनुमति दी गई।

कैसे हुआ था हादसा

हरीश राणा ने वर्ष 2010 में चंडीगढ़ में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की थी। वर्ष 2013 में अंतिम वर्ष के दौरान रक्षाबंधन के दिन एक दुर्घटना में वह पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए थे। गंभीर चोटों के कारण उन्हें पहले पीजीआई चंडीगढ़ और बाद में दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया।

डॉक्टरों ने उन्हें क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित बताया, जिससे उनके शरीर के चारों अंग निष्क्रिय हो गए थे और वह पूरी तरह बिस्तर पर निर्भर हो गए थे।

संवेदनशील मामला

हरीश राणा का मामला देश में इच्छामृत्यु से जुड़े कानूनी और नैतिक पहलुओं पर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर सामने आया है। यह घटना न केवल एक परिवार के दर्द को दर्शाती है, बल्कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के अधिकारों पर भी व्यापक चर्चा को जन्म देती है।