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बोधघाट परियोजना पर बढ़ा आदिवासी विरोध, भाजपा नेताओं की गैरमौजूदगी पर उठे सवाल

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जगदलपुर। बस्तर संभाग की बहुप्रतीक्षित लेकिन विवादों में घिरी बोधघाट परियोजना को लेकर आदिवासियों का विरोध लगातार तेज होता जा रहा है। परियोजना के लिए चल रहे सर्वे कार्य के बीच प्रभावित गांवों के ग्रामीणों ने 21 जून को एक बड़ी बैठक आयोजित की, जिसमें दावा किया गया कि परियोजना से लगभग 56 गांवों के 50 हजार से अधिक आदिवासी प्रभावित होंगे।

बैठक में क्षेत्र के भाजपा और कांग्रेस नेताओं, सांसदों तथा विधायकों को आमंत्रित किया गया था। हालांकि, ग्रामीणों के अनुसार भाजपा का कोई भी विधायक, सांसद या वरिष्ठ नेता बैठक में शामिल नहीं हुआ। वहीं कांग्रेस की ओर से बीजापुर विधायक विक्रम मंडावी, जगदलपुर के पूर्व विधायक रेखचंद जैन, नारायणपुर के पूर्व विधायक चंदन कश्यप सहित कई नेताओं ने बैठक में पहुंचकर ग्रामीणों के आंदोलन को समर्थन दिया।

बैठक में उपस्थित ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों ने परियोजना से होने वाले संभावित विस्थापन, जल-जंगल-जमीन पर प्रभाव और आदिवासी अधिकारों को लेकर चिंता जताई। ग्रामीणों का कहना है कि उनकी सहमति के बिना परियोजना को आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।

बलिराम कश्यप भी करते रहे थे विरोध

बोधघाट परियोजना को लेकर एक राजनीतिक पहलू भी चर्चा में है। उल्लेखनीय है कि बस्तर के वरिष्ठ आदिवासी नेता, पूर्व सांसद और मध्यप्रदेश सरकार में मंत्री रहे स्वर्गीय बलिराम कश्यप इस परियोजना के मुखर विरोधियों में शामिल थे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में हजारों आदिवासियों को संगठित कर बोधघाट परियोजना के खिलाफ आंदोलन और प्रदर्शन का नेतृत्व किया था।

गौरतलब है कि स्वर्गीय बलिराम कश्यप वर्तमान छत्तीसगढ़ सरकार में वन मंत्री केदार कश्यप के पिता थे। ऐसे में परियोजना को लेकर भाजपा की वर्तमान नीति और पूर्व में बलिराम कश्यप के रुख को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।

आदिवासियों का सवाल—क्या सुनी जाएगी उनकी आवाज?

परियोजना प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि विकास के नाम पर यदि हजारों लोगों का विस्थापन होता है तो उनकी राय और अधिकारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। वहीं भाजपा नेताओं की बैठक से दूरी को लेकर भी ग्रामीणों के बीच सवाल उठ रहे हैं। अब देखना होगा कि सरकार परियोजना को लेकर आदिवासी समुदाय की आशंकाओं और मांगों पर क्या रुख अपनाती है।