समान नागरिक संहिता पर छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी का बड़ा प्रस्ताव: जाति-विशिष्ट कानूनों के स्थान पर ‘सार्वभौमिक अपराध निवारण संहिता’ की वकालत

रायपुर। छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) के क्रियान्वयन को लेकर राज्य स्तर पर गठित उच्च स्तरीय समिति के समक्ष विभिन्न संगठनों और सामाजिक प्रतिनिधियों द्वारा अपने सुझाव लगातार दर्ज कराए जा रहे हैं। इसी क्रम में, ‘छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी’ की ओर से सचिव, उच्च स्तरीय समिति (समान नागरिक संहिता, छत्तीसगढ़) को एक विस्तृत और क्रांतिकारी प्रस्ताव सौंपा गया है। संस्था के संयोजक डॉ. कुलदीप सोलंकी (एमडी, डीएम) की ओर से दिए गए इस ज्ञापन में राज्य और समाज में एक समतामूलक, न्यायसंगत और सुदृढ़ सामाजिक व्यवस्था के निर्माण के लिए कई महत्वपूर्ण बिंदु उठाए गए हैं।
जाति-विशिष्ट विधानों के स्थान पर सार्वभौमिक संहिता की मांग
छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी ने अपने प्रस्ताव के पहले हिस्से में वर्तमान में प्रचलित वर्ग अथवा जाति-विशिष्ट संशोधनों व सुरक्षात्मक कानूनों को समाप्त करने की पुरजोर वकालत की है। इसके स्थान पर एक ‘सार्वभौमिक नागरिक अपराध एवं उत्पीड़न निवारण अधिनियम’ स्थापित करने का सुझाव दिया गया है।
अपराध की प्रकृति बने न्याय का आधार: प्रस्ताव में कहा गया है कि विधिक कार्रवाई और न्याय प्रणाली का मूल आधार अपराधी या पीड़ित की जातिगत पहचान न होकर, केवल और केवल ‘अपराध की प्रकृति एवं उसकी गंभीरता’ होना चाहिए।
निष्पक्ष सुरक्षा का अधिकार: किसी भी भारतीय नागरिक के विरुद्ध पूर्वाग्रह से प्रेरित होकर किए जाने वाले उत्पीड़न या भेदभाव के मामलों में जातिगत पृष्ठभूमि से परे हटकर कठोरतम दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान हो।
पूर्व-जांच समिति का गठन: कानून के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए यह सुझाव भी दिया गया है कि इस अधिनियम के तहत मामला दर्ज करने से पूर्व एक उच्च स्तरीय निष्पक्ष समिति का गठन किया जाए, जो घटना की सत्यता और तथ्यों की गहन जांच कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
जातिविहीन भारतीय समाज और समानता की संकल्पना
प्रस्तावित नीति के तहत एक वास्तविक समतामूलक और जातिविहीन समाज की स्थापना के लिए प्रशासनिक व शासकीय नीतियों में आमूलचूल परिवर्तन पर जोर दिया गया है।
जातिगत पहचान का विलोपन: नागरिकों के समस्त शासकीय दस्तावेजों, पहचान पत्रों और संस्थागत अभिलेखों से जातिगत पहचान के अनिवार्य उल्लेख को समाप्त किया जाए, ताकि राज्य और नागरिक के संबंधों के मध्य जातिगत विभाजन समाप्त हो सके।
आवश्यकता-आधारित कल्याणकारी नीतियां: वंचित नागरिकों के उत्थान के लिए सहायता व्यवस्था को उनकी वास्तविक आर्थिक स्थिति और एक निश्चित समयावधि पर आधारित किया जाए। संस्था का मानना है कि सकारात्मक कार्रवाई का ध्येय किसी वर्ग को स्थायी रूप से राज्य पर आश्रित बनाना नहीं, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर और सक्षम बनाना होना चाहिए।
जाति और धर्म निरपेक्ष छात्र कल्याण: छात्रवृत्ति, निःशुल्क कोचिंग और छात्रावास जैसी योजनाएं पूरी तरह जाति और धर्म से निरपेक्ष तथा पारदर्शी हों, ताकि केवल आर्थिक रूप से पिछड़े और जरूरतमंद विद्यार्थियों को ही इनका लाभ मिल सके।
अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन योजना की समीक्षा: एक आदर्श और कास्टलेस समाज की स्थापना के उद्देश्य से अंतरजातीय विवाहों पर दी जाने वाली आर्थिक प्रोत्साहन राशि को समाप्त करने का सुझाव दिया गया है, ताकि कृत्रिम सामाजिक विभाजनों को बढ़ावा न मिले।
ग्राम पंचायतों की न्यायिक भागीदारी और पूजा स्थल नीति
प्रस्ताव के अंतिम चरण में कुछ अन्य महत्वपूर्ण व्यावहारिक सुझाव भी शामिल किए गए हैं:
ग्राम पंचायतों की भूमिका: स्थानीय स्तर पर छोटे-मोटे दीवानी और संपत्ति संबंधी विवादों को आपसी सहमति से सुलझाने के लिए ग्राम पंचायतों को अधिकृत किया जाए, जिससे अदालतों पर मुकदमों का अनावश्यक बोझ कम हो सके।
पूजा स्थल नीति: सभी वर्गों के पूजा स्थलों को लेकर या तो राज्य धर्म के मामलों में पूरी तरह अहस्तक्षेप की नीति अपनाए, अथवा नियंत्रण की नीति होने पर “सर्वधर्म समभाव” की भावना के तहत वह सभी के लिए समान हो।
ज्ञापन के अंत में छत्तीसगढ़ सिविल सोसायटी ने अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए कहा है कि यदि सरकार द्वारा इस ऐतिहासिक एवं दूरगामी नीतिगत प्रारूप को तैयार करने का दायित्व संस्था को सौंपा जाता है, तो वे इस राष्ट्र-निर्माण के कार्य को पूर्ण निष्ठा और दायित्वबोध के साथ संपन्न करने के लिए तत्पर हैं। सिविल सोसायटी से डा. कुलदीप सोलंकी, डा. सुरभि दुबे, डा. के.पी. आजमानी के प्रतिनिधियों ने भी यूसीसी को अधिक पारदर्शी और व्यावहारिक बनाने के लिए अपने बहुमूल्य सुझाव दिए।





