अंकों के बीच फंसा भरोसा: सीबीएसई की नई कॉपी जांच व्यवस्था पर उठते सवाल- आकांक्षा तिवारी “वर्षा”

देश में बोर्ड परीक्षाएं अब केवल स्कूल शिक्षा का हिस्सा भर नहीं रह गई हैं। आज बारहवीं के अंक सीधे विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ चुके हैं। मेडिकल, इंजीनियरिंग, विधि, मैनेजमेंट, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और कई प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश के लिए बोर्ड प्रतिशत निर्णायक भूमिका निभाते हैं। ऐसे में एक-दो अंक का अंतर भी किसी विद्यार्थी के लिए अवसर और निराशा के बीच की दूरी बन जाता है। इसलिए जब कॉपी जांच व्यवस्था पर सवाल उठते हैं, तो चिंता केवल रिजल्ट की नहीं रहती, बल्कि पूरे भविष्य की हो जाती है।
इस वर्ष सीबीएसई बोर्ड परिणामों के बाद बड़ी संख्या में विद्यार्थियों और अभिभावकों ने मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर असंतोष जताया। खासतौर पर फिजिक्स, केमिस्ट्री और गणित जैसे विषयों में अपेक्षा से बेहद कम अंक आने की शिकायतें लगातार सामने आईं। कई ऐसे विद्यार्थी, जिन्होंने जेईई जैसी कठिन प्रतियोगी परीक्षाओं में अच्छा प्रदर्शन किया, वे बोर्ड परीक्षा में आश्चर्यजनक रूप से कम अंक प्राप्त करते दिखाई दिए। स्वाभाविक रूप से विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में सवाल उठा कि आखिर समस्या तैयारी में थी या मूल्यांकन प्रक्रिया में?
दरअसल, इस बार सीबीएसई ने बड़े स्तर पर “ऑन स्क्रीन मार्किंग” -ओएसएम यानी डिजिटल मूल्यांकन प्रणाली लागू की। इस व्यवस्था में विद्यार्थियों की उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर परीक्षकों के सामने ऑनलाइन जांच के लिए उपलब्ध कराया जाता है। उद्देश्य था प्रक्रिया को तेज, आधुनिक और अधिक पारदर्शी बनाना। लेकिन नई व्यवस्था का पहला बड़ा अनुभव ही विवादों के घेरे में आ गया।
कई विद्यार्थियों ने शिकायत की कि उनकी कॉपियों के कुछ हिस्से स्पष्ट दिखाई नहीं दे रहे थे, कुछ पन्ने ठीक से स्कैन नहीं हुए थे और कई जगह लंबे उत्तर या डायग्राम अधूरे दिखाई दे रहे थे। बाद में यह जानकारी भी सामने आई कि बड़ी संख्या में उत्तर पुस्तिकाओं को दोबारा स्कैन करना पड़ा। यानी तकनीकी स्तर पर त्रुटियों की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता।
नई तकनीक के साथ सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि उसका प्रभाव सीधे उन विद्यार्थियों पर पड़ता है जिनके पास प्रयोग दोहराने का अवसर नहीं होता। किसी तकनीकी बदलाव की प्रक्रिया में यदि छोटी सी भी चूक हो जाए, तो उसका असर लाखों विद्यार्थियों के परिणामों पर दिखाई देता है। यही कारण है कि इस बार रिजल्ट आने के बाद विद्यार्थियों के बीच असंतोष और अविश्वास दोनों बढ़े।
इसी बीच सीबीएसई द्वारा री-चेकिंग, वेरिफिकेशन और री-इवैल्यूएशन की फीस में भारी कटौती का निर्णय भी चर्चा का विषय बन गया। अब विद्यार्थी कम शुल्क में अपनी उत्तर पुस्तिका देख सकेंगे और यदि पुनर्मूल्यांकन में अंक बढ़ते हैं, तो फीस वापस करने का प्रावधान भी किया गया है।
यह निर्णय राहत जरूर देता है, लेकिन साथ ही कई बड़े सवाल भी छोड़ जाता है। यदि नई मूल्यांकन प्रणाली पूरी तरह सटीक और त्रुटिहीन है, तो फिर इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थियों को पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता क्यों महसूस हो रही है? और यदि तकनीकी गड़बड़ियों की संभावना है, तो उसका प्रभाव किस पर पड़ेगा? निश्चित रूप से उस विद्यार्थी पर, जिसके लिए यही अंक भविष्य के दरवाजे खोलते हैं।
आज का विद्यार्थी केवल बोर्ड परीक्षा नहीं दे रहा होता, बल्कि वह एक ऐसी प्रतिस्पर्धा का हिस्सा है जहां उसके आगे और पीछे कई वर्षों की बैच एक साथ अवसरों के लिए प्रतिस्पर्धी बन चुकी हैं। ऐसे में बोर्ड परीक्षा के अंक और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। किसी कॉलेज में प्रवेश छूट जाना केवल एक सीट खोना नहीं होता, बल्कि कभी-कभी पूरा करियर मार्ग बदल जाना होता है।
सबसे बड़ी चिंता मानसिक दबाव की है। जब कोई विद्यार्थी सालभर मेहनत करने के बाद ऐसा परिणाम देखता है जो उसकी तैयारी और प्रदर्शन से मेल नहीं खाता, तो वह केवल अंक नहीं खोता, बल्कि स्वयं पर विश्वास भी खोने लगता है। परिवार, समाज और लगातार बढ़ती प्रतिस्पर्धा का दबाव स्थिति को और कठिन बना देता है।
तकनीक का विरोध समाधान नहीं है। डिजिटल मूल्यांकन समय की आवश्यकता है और इससे पारदर्शिता भी बढ़ सकती है। लेकिन शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में तकनीक के साथ जवाबदेही और मानवीय सतर्कता भी उतनी ही जरूरी है,क्योंकि एक छोटी तकनीकी त्रुटि भी किसी विद्यार्थी के वर्षों की मेहनत पर भारी पड़ सकती है।
सीबीएसई का हालिया निर्णय विद्यार्थियों को राहत देता है, लेकिन जरूरत केवल फीस कम करने की नहीं, बल्कि ऐसी विश्वसनीय व्यवस्था बनाने की है जिसमें विद्यार्थियों को अपने ही अंकों की सत्यता पर संदेह न करना पड़े, क्योंकि शिक्षा व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत केवल तकनीक नहीं, बल्कि विद्यार्थियों का भरोसा होता है।




