कही-सुनी (08 NOV-26) : राज्यपाल के डीएमएफ की बैठक लेने का मतलब क्या ?

रवि भोई की कलम से
आमतौर पर जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू होता है, तो राज्यपाल शासन के मुखिया होते हैं और अफसरों की मीटिंग लेकर उन्हें निर्देश देते हैं और कार्यों की मॉनिटरिंग करते हैं। चुनी हुई सरकार में शासन चलाने का काम मुख्यमंत्री का होता है। राज्यपाल तो संवैधानिक प्रमुख होते हैं। छत्तीसगढ़ में चुनी हुई सरकार हैं और इस सरकार के मुखिया विष्णुदेव साय हैं। ऐसे में पांच नवंबर को छत्तीसगढ़ के राज्यपाल रमेन डेका का कुछ कलेक्टरों को राजभवन बुलाकर जिला खनिज न्यास (डीएमएफ) की बैठक लेने का मतलब क्या है। राज्यपाल की बैठक के कई मायने निकाले जा रहे हैं। कुछ लोग चर्चा कर रहे हैं कि केंद्र सरकार ने शायद राज्यपाल को सरकार के कामकाज में सीधे हस्तक्षेप का अधिकार दिया है। केंद्र और राज्य में भाजपा की ही सरकार है। इसके बाद भी केंद्र सरकार ने राज्यपाल को ऐसा करने के लिए क्यों कहा होगा, यह लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय है? देखा जाता है कि जब राज्य और केंद्र में अलग-अलग पार्टियों की सरकार होती है, तब सरकार और राजभवन की धुरी अलग घूमती है। कहते हैं कि राज्यपाल अलग -अलग स्रोतों से जानकारी एकत्र कर केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेजते हैं। परंपरा है कि मुख्यमंत्री समय-समय पर राज्यपाल से मुलाक़ात करते हैं, उन्हें जानकारी देते हैं। अब तक राज्यपाल द्वारा राज्य के मुख्य सचिव, डीजीपी और गृह सचिव जैसे बड़े अफसरों को तलब कर जानकारी लेने की बात सामने आती रही है। राज्यपाल से अलग-अलग प्रतिनिधिमंडल और लोग मिलते हैं, उन्हें जानकारी देते हैं। कलेक्टरों की बैठक लेकर उन्हें दिशा-निर्देश देने को नई परंपरा कहा जा रहा है। इस बैठक में खनिज विभाग के सचिव पी दयानंद भी मौजूद थे। इसके पहले राज्यपाल रमेन डेका कई जिलों का दौरा कर जिला प्रशासन की बैठक ले चुके हैं। अब देखते हैं डीएमएफ की राज्यपाल द्वारा मॉनिटरिंग कोई राजनीतिक रंग लेता हैं या रूटीन प्रक्रिया बनकर बात ठंडी हो जाती है। जरूर, मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने दीवाली भेंट के बहाने सात नवंबर को राज्यपाल रमेन डेका से मुलाक़ात की।
बिना चेयरमैन के राज्य लोकसेवा आयोग
छत्तीसगढ़ राज्य लोकसेवा आयोग दो महीने से बिना चेयरमैन के चल रहा है। आठ सितंबर को रीता शांडिल्य का कार्यकाल समाप्त होने के बाद सरकार ने अब तक किसी को पीएससी का चेयरमैन नियुक्त नहीं किया है और न ही किसी को कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है। कहते हैं बिना अध्यक्ष के पीएससी कामकाज ठप पड़ा है। बताते हैं पीएससी का रुटीन का काम भी नहीं हो पा रहा है। पीएससी के कार्यकारी अध्यक्ष के लिए भी राज्यपाल के दस्तखत से आदेश जारी होता है। रीता शांडिल्य के पहले डॉ प्रवीण वर्मा कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। वे अभी सदस्य हैं। डॉ वर्मा के अलावा पीएससी में दो सदस्य और भी हैं। सुनने में आ रहा है कि डॉ प्रवीण वर्मा ने इस बार कार्यकारी अध्यक्ष बनने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। डॉ प्रवीण वर्मा को भूपेश बघेल के राज में पीएससी का सदस्य बनाया गया था। हल्ला है कि पीएससी चेयरमैन के लिए सरकार को मनपसंद उम्मीदवार नहीं मिल पा रहा है। सरकार ने एक वरिष्ठ महिला अफसर को परोक्ष तौर से चेयरमैन बनने का ऑफर दिया था, लेकिन उनके तरफ से कोई सकारत्मक जवाब नहीं मिला। लोगों को, खासतौर से युवाओं को पीएससी के नए चेयरमैन का बेसब्री से इंतजार है।
ट्रांसफर अनुशंसा पत्र से परेशान मंत्री जी
कहते हैं छत्तीसगढ़ के एक मंत्री जी तबादलों के लिए बड़ी संख्या मिल रहे अनुशंसा पत्रों से बड़े परेशान हैं। बताते हैं हजारों तबादलों के बाद भी अनुशंसा पत्रों की बाढ़ थम नहीं रही है। उलटे मंत्री जी पर आरोपों की बौछार हो रही है। मंत्री जी ने अनुशंसा लेटर भेजने वालों का पूरा ब्यौरा बना रखा है। लेखा-जोखा मुख्यमंत्री और भाजपा संगठन को भी पेश कर दिया है, फिर भी मंत्री जी चक्रव्यूह से निकल नहीं पा रहे हैं। कहा जा रहा है ट्रांसफर की सिफारिश करने वालों में मंत्री-विधायकों और सांसदों से लेकर आरएसएस से जुड़े लोग भी शामिल हैं। बताते हैं बहती गंगा में हाथ धोने में मंत्री-विधायक और सांसदों के चेले भी पीछे नहीं हैं। पूर्व माननीय भी लाव-लश्कर के साथ पहुंच जाते हैं। सुनने में आ रहा है कि आरएसएस और अन्य संगठनों से जुड़े लोगों की सिफारिश पर मंत्री जी ने 90 से अधिक लोगों का तबादला आदेश जारी किया। बताते हैं एक विधायक जी कई लोगों का तबादला कराने मंत्री जी के पास पहुँच गए। मंत्री जी ने समन्वय से अनुमोदन लेकर दो सांसदों के दर्जनों लोगों को इधर से उधर किया, पर मंत्री जी के विभाग में इतने अधिक स्टाफ हैं कि तबादला कराने वालों की कतार थम ही नहीं रही है।
अमित शाह भारी व्यस्तता के बीच आए
दिल्ली में राजनीतिक उबाल के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन नवंबर को राजधानी रायपुर आए। कहते हैं वे जल्दी आए और जल्दी गए। बताते हैं आज की तारीख में अमित शाह देश में छाया प्रधानमंत्री की तरह काम कर रहे हैं और हर राज्यों का दौरा कर रहे हैं। सुनने में आ रहा है कि तीन नवंबर को शाम साढ़े सात बजे अमित शाह की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ महत्वपूर्ण बैठक थी। इस कारण अमित शाह कार्यक्रमों के समय में कटौती कर जल्दी दिल्ली चले गए। जल्दी दिल्ली लौटने के चक्कर में अमित शाह पूर्व निर्धारित कार्यक्रम से काफी कम समय रुके, पर सभी तय प्रोग्राम में शामिल हुए। उन्होंने राज्योत्सव के समापन में मुख्य अतिथि के रूप भाषण दिया, भले सभी सम्मानित लोगों को अपने हाथों से पुरस्कार नहीं दिया। गुजराती समाज के प्रतिनिधिमंडल से मिले। मंत्री ओपी चौधरी के कार्यक्रम भी गए। रायपुर के देवेंद्र नगर स्थित निजी अस्पताल आर्टेमिस शांति हॉस्पिटल का लोकार्पण किया। इस अस्पताल के डायरेक्टर डॉ कमलेश अग्रवाल हैं। रायपुर में काफी कम समय रुकने के बाद भी अमित शाह ने डॉ अग्रवाल के कारण निजी अस्पताल के प्रोग्राम को तवज्जो दिया। व्यस्त समय में अमित शाह का आर्टेमिस शांति अस्पताल में पहुंचना चर्चा का विषय भी रहा। डॉ अग्रवाल का आरएसएस और भाजपा के दिग्गजों से करीबी संबंध है।
रायपुर के बीजेपी पार्षद ही सड़क पर
रायपुर नगर निगम में बीजेपी की सत्ता है और पिछले दिनों जोन आठ के बीजेपी पार्षद ही दफ्तर में तालाबंदी कर धरने पर बैठ गए। निगम में सत्तारूढ़ दल के पार्षदों की नहीं सुनी जा रही है तो फिर आम जनता के क्या होगें, इसका अनुमान लगाया जा सकता है। कहते हैं रायपुर नगर निगम के नए कमिश्नर संबित मिश्रा ने पार्षदों का नकेल कस दिया है। इसके कारण जोन आठ ही नहीं, बल्कि दूसरे पार्षद भी कसमसा रहे हैं। बताते हैं कमिश्नर संबित मिश्रा ने जोन कमिश्नरों के अधिकारों में भी कटौती कर दी ही। बहुत सारे काम को सेंट्रलाइज्ड कर दिया है। इससे वर्षों पुराना सिस्टम बेपटरी हो गई। गली-मोहल्लों की सफाई से लेकर स्ट्रीट लाइट को लेकर हाहाकार जैसी स्थिति बन गई है। सरकार ने संबित मिश्रा को बीजापुर के कलेक्टर पद से हटाकर रायपुर नगर निगम कमिश्नर बना दिया है। 2018 बैच के संबित मिश्रा के लिए यह तो पनिशमेंट पोस्टिंग जैसा है। सरकार ने उन्हें जिले के राजा से पानी-सफाई और बिजली के काम में लगा दिया और एक कलेक्टर के मातहत कर दिया। अब वे मन लगाकर काम करें तो करें कैसे ? हल्ला तो यह है कि संबित मिश्रा रायपुर नगर निगम में रहना नहीं चाहते। उनके कई बैचमेट अभी कलेक्टर हैं। माना जा रहा है कि इसलिए उन्हें किसी का फिक्र नहीं है और न ही डर। यह भी कहा जा रहा है कि नेता-पार्षद उनके नाम का रोना रोयेंगे तो वे जल्दी हटेंगे।
रोबोट से भी तेज कलेक्टर साहब
बताते हैं छत्तीसगढ़ के राज्योत्सव में लोगों के मनोरंजन के लिए आयोजकों ने एक रोबोट रख रखा था, उसे छत्तीसगढ़िया परिधान पहनाया गया था। रोबोट डांस करता था। सुनने में आ रहा है कि राज्योत्सव के समापन के मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के कार्यक्रम की तैयारी के दौरान एक कलेक्टर साहब का सामना रोबोट से हो गया। कलेक्टर साहब रोबोट से आगे निकलने की कोशिश करते थे,पर रोबोट था कि उन्हें आगे निकलने ही नहीं देता। बाद में कलेक्टर साहब किसी तरह रोबोट को दरकिनार कर आगे निकल पाए। कलेक्टर साहब और रोबोट की दौड़ काफी चर्चा में रही।
(लेखक पत्रिका समवेत सृजन के प्रबंध संपादक और स्वतंत्र पत्रकार हैं।)
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