#प्रदेश

डॉक्टरों की कमी नहीं, भर्ती की कमी! छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल

Advertisement Carousel

रायपुर। छत्तीसगढ़ की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। प्रदेश में डॉक्टरों की कमी का दावा किया जाता है, लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल में 17 हजार से अधिक डॉक्टर पंजीकृत हैं, इसके बावजूद वर्ष 2020 के बाद से सीजीपीएससी के माध्यम से नियमित डॉक्टरों की भर्ती नहीं हुई है। इस स्थिति को लेकर छत्तीसगढ़ सिविल सोसाइटी ने मुख्य सचिव को 16 पन्नों का विस्तृत पत्र सौंपकर स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की मांग की है।

सिविल सोसाइटी का कहना है कि प्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों में डॉक्टरों, विशेषज्ञों और शिक्षकों के सैकड़ों पद खाली पड़े हैं। सबसे चिंताजनक स्थिति सीनियर रेजिडेंट (एसआर) पदों की है, जहां 72 प्रतिशत से अधिक पद रिक्त हैं। वहीं प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के लगभग आधे पद खाली होने से चिकित्सा शिक्षा भी प्रभावित हो रही है।

विशेषज्ञ डॉक्टरों की भारी कमी

राज्य में चिकित्सा विशेषज्ञों के 1,773 स्वीकृत पदों में से केवल 355 पदों पर ही डॉक्टर कार्यरत हैं, जबकि 1,418 पद खाली हैं। यानी करीब 80 प्रतिशत पद रिक्त हैं। कई जिलों, विशेषकर सुकमा और मोहला-मानपुर जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या शून्य बताई गई है।

17 हजार डॉक्टर पंजीकृत, फिर भी भर्ती नहीं

मेडिकल काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 11,132 एमबीबीएस डॉक्टर, 2,850 एमडी विशेषज्ञ, 2,740 एमएस सर्जन तथा 420 सुपर स्पेशलिस्ट पंजीकृत हैं। इसके अलावा लगभग 5,000 अस्थायी डॉक्टर भी उपलब्ध हैं। इसके बावजूद नियमित नियुक्तियां नहीं होने से सरकारी अस्पतालों में सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।

मेडिकल कॉलेजों की स्थिति भी चिंताजनक

कांकेर मेडिकल कॉलेज में कई महत्वपूर्ण विभागों में एक भी फैकल्टी नहीं है और छात्रों के लिए हॉस्टल सुविधा तक उपलब्ध नहीं है। वहीं राजनांदगांव मेडिकल कॉलेज में कई विभाग बिना विभागाध्यक्ष और प्रोफेसरों के संचालित हो रहे हैं। रेडियोलॉजी विभाग एक अस्थायी डॉक्टर के भरोसे चल रहा है।

निजी अस्पतालों पर बढ़ती निर्भरता

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि छत्तीसगढ़ की लगभग 85 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं निजी क्षेत्र के भरोसे संचालित हो रही हैं, जबकि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की हिस्सेदारी 15 प्रतिशत के आसपास सिमट गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे गरीब और मध्यम वर्ग पर इलाज का आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।

बॉण्ड नीति पर भी सवाल

सिविल सोसाइटी ने वर्तमान बॉण्ड नीति को अव्यावहारिक बताते हुए कहा है कि एमबीबीएस डॉक्टरों के लिए दो वर्ष की अनिवार्य सेवा या 25 लाख रुपये तथा पीजी डॉक्टरों के लिए दो वर्ष की सेवा या 50 लाख रुपये के दंड का प्रावधान प्रतिभाओं को राज्य से बाहर जाने के लिए मजबूर कर रहा है।

सरकार से प्रमुख मांगें

  • सीजीपीएससी के माध्यम से डॉक्टरों और चिकित्सा शिक्षकों की तत्काल नियमित भर्ती।
  • ग्रामीण सेवा करने वाले डॉक्टरों को बोनस अंक।
  • इंटर्न डॉक्टरों का मानदेय बढ़ाकर 40 हजार रुपये और बांडेड डॉक्टरों का मानदेय एक लाख रुपये किया जाए।
  • मेडिकल कॉलेजों में फैकल्टी और बुनियादी सुविधाओं की कमी दूर की जाए।
  • सरकारी अस्पतालों में किडनी, लीवर और हार्ट ट्रांसप्लांट जैसी सुपर स्पेशियलिटी सेवाएं शुरू की जाएं।

सिविल सोसाइटी का कहना है कि योग्य डॉक्टरों की उपलब्धता के बावजूद नियमित भर्तियों में देरी न केवल स्वास्थ्य सेवाओं को प्रभावित कर रही है, बल्कि यह नागरिकों के बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं पाने के अधिकार पर भी प्रतिकूल असर डाल रही है।