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युवाओं में बढ़ रहा तंबाकू का खतरा: 30-40 की उम्र में कैंसर और फेफड़ों की गंभीर बीमारियों के मामले बढ़े, डॉक्टरों ने दी चेतावनी

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रायपुर। विश्व तंबाकू निषेध दिवस (31 मई) से पहले रामकृष्णा केयर अस्पताल के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने युवाओं में तेजी से बढ़ रहे तंबाकू सेवन को लेकर गंभीर चिंता जताई है। डॉक्टरों का कहना है कि अब 30 से 40 वर्ष की उम्र के लोगों में भी फेफड़ों की बीमारियां, सीओपीडी और विभिन्न प्रकार के कैंसर तेजी से सामने आ रहे हैं, जो चिंताजनक संकेत हैं।

इस वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने “तंबाकू और निकोटीन के आकर्षण का पर्दाफाश” थीम निर्धारित की है। इसका उद्देश्य युवाओं को ई-सिगरेट, निकोटीन पाउच, फ्लेवर्ड वेपिंग डिवाइस और आकर्षक पैकेजिंग के जरिए तंबाकू की ओर खींचने वाली रणनीतियों के प्रति जागरूक करना है।

देश में हर तीसरा कैंसर तंबाकू से जुड़ा

रामकृष्णा केयर अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. रवि जायसवाल ने बताया कि तंबाकू केवल फेफड़ों के कैंसर का कारण नहीं है, बल्कि मुंह, गला, स्वरयंत्र, भोजन नली, पेट, लिवर, अग्न्याशय, किडनी, मूत्राशय और रक्त कैंसर जैसी कई गंभीर बीमारियों से भी इसका सीधा संबंध है।

उन्होंने कहा कि भारत में होने वाले लगभग एक-तिहाई कैंसर तंबाकू सेवन से जुड़े होते हैं। लगातार खांसी, बलगम में खून, वजन घटना, मुंह में न भरने वाले घाव, आवाज में बदलाव और निगलने में परेशानी जैसे लक्षणों को कभी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

कम उम्र में कमजोर हो रहे फेफड़े

सीनियर पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. सुशील जैन के अनुसार, बड़ी संख्या में युवा लगातार खांसी, सांस फूलने, अस्थमा और शुरुआती सीओपीडी जैसी समस्याओं के साथ अस्पताल पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोग अक्सर यह मानते हैं कि तंबाकू का नुकसान कई वर्षों बाद दिखाई देता है, जबकि इसकी शुरुआत शरीर में बहुत पहले हो जाती है।

भारत में वर्तमान में 5.5 करोड़ से अधिक लोग सीओपीडी जैसी गंभीर फेफड़ों की बीमारी से प्रभावित हैं, जिसमें धूम्रपान प्रमुख कारणों में शामिल है।

ई-सिगरेट भी नहीं है सुरक्षित विकल्प

सीनियर पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. गिरीश अग्रवाल ने चेतावनी देते हुए कहा कि ई-सिगरेट, निकोटीन पाउच और फ्लेवर्ड वेपिंग डिवाइस को सुरक्षित विकल्प बताकर प्रचारित किया जाता है, लेकिन ये भी निकोटीन की लत, फेफड़ों में सूजन और दीर्घकालिक नुकसान का कारण बन सकते हैं।

निष्क्रिय धूम्रपान भी उतना ही खतरनाक

विशेषज्ञों ने बताया कि घरों में धूम्रपान करने वालों के कारण बच्चे और बुजुर्ग भी प्रभावित होते हैं। सेकेंड हैंड स्मोक से श्वसन संक्रमण, अस्थमा, हृदय रोग और फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।

हर साल 1.7 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान

डॉक्टरों के मुताबिक तंबाकू से जुड़ी बीमारियों के कारण भारत को हर वर्ष 1.7 लाख करोड़ रुपये से अधिक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। देश में करीब 26.7 करोड़ लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू का सेवन करते हैं और हर साल 13 लाख से ज्यादा लोगों की मौत तंबाकू जनित बीमारियों से होती है।

तंबाकू छोड़ना संभव, जरूरत है सही मार्गदर्शन की

विशेषज्ञों ने लोगों से तंबाकू छोड़ने के लिए चिकित्सकीय सहायता लेने की अपील की। उन्होंने बताया कि काउंसलिंग, व्यवहारिक थेरेपी, निकोटीन रिप्लेसमेंट थेरेपी और विशेषज्ञों की मदद से तंबाकू की लत पर सफलतापूर्वक काबू पाया जा सकता है।

डॉ. गिरीश अग्रवाल ने कहा, “तंबाकू केवल सेवन करने वाले व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार, समाज और स्वास्थ्य व्यवस्था को प्रभावित करता है। सही उपचार और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ इसे छोड़ना पूरी तरह संभव है।”