एआई का बढ़ता उपयोग, लोगों की घटती रचनात्मक क्षमता?

कृत्रिम बुद्धिमत्ता -यानी एआई ने हमारे काम करने, सीखने और सोचने के तरीके को तेजी से बदल दिया है। आज लेखन, चित्र निर्माण, वीडियो संपादन, शोध, अनुवाद और यहां तक कि रचनात्मक विचारों के विकास में भी एआई का उपयोग बढ़ता जा रहा है। इससे काम आसान, तेज और अधिक सुलभ हुआ है। लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी उभर रहा है—क्या एआई का बढ़ता उपयोग हमारी रचनात्मक क्षमता को कमजोर कर रहा है?
रचनात्मकता केवल नया विचार पैदा करने की क्षमता नहीं है। यह जिज्ञासा, कल्पनाशक्ति, अनुभव, संवेदना और समस्या-समाधान की प्रक्रिया का परिणाम होती है। जब कोई व्यक्ति किसी विषय पर स्वयं सोचता है, संघर्ष करता है, गलतियां करता है और फिर कोई नया समाधान खोजता है, तभी उसकी रचनात्मकता विकसित होती है।
एआई इस प्रक्रिया को छोटा कर देता है। अब किसी लेख का प्रारूप चाहिए, कविता लिखनी है, भाषण तैयार करना है या चित्र बनाना है, तो कुछ सेकंड में तैयार सामग्री सामने आ जाती है। सुविधा के इस दौर में लोगों के भीतर स्वयं विचार करने का धैर्य और अभ्यास कम होने का खतरा पैदा हो रहा है।
विशेष रूप से विद्यार्थियों और युवाओं के लिए यह चुनौती अधिक गंभीर है। यदि हर प्रश्न का उत्तर एआई से मिल जाएगा, तो शोध, विश्लेषण और स्वतंत्र चिंतन की आदत कमजोर पड़ सकती है। धीरे-धीरे मस्तिष्क तैयार उत्तरों का उपभोक्ता बन सकता है, सृजनकर्ता नहीं।
हालांकि समस्या एआई में नहीं, उसके उपयोग के तरीके में है। इतिहास बताता है कि हर नई तकनीक के आने पर ऐसे सवाल उठे हैं। कैलकुलेटर आने पर गणना कौशल, इंटरनेट आने पर स्मरण शक्ति और सोशल मीडिया आने पर संवाद क्षमता को लेकर भी चिंताएं व्यक्त की गई थीं। फिर भी मनुष्य ने तकनीक और अपनी क्षमताओं के बीच संतुलन बनाना सीखा।
एआई को रचनात्मकता का विकल्प नहीं, बल्कि सहयोगी उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि कोई लेखक एआई से केवल तथ्य जुटाने में मदद ले और विचार स्वयं विकसित करे, तो उसकी रचनात्मकता बनी रहती है। यदि कोई छात्र एआई से मार्गदर्शन लेकर स्वयं समाधान खोजे, तो उसका बौद्धिक विकास भी होता है।
वास्तविक खतरा तब पैदा होता है जब एआई सोचने, समझने और सृजन करने की पूरी प्रक्रिया का स्थान लेने लगे। इससे बौद्धिक आलस्य बढ़ सकता है। व्यक्ति प्रश्न पूछने के बजाय उत्तर लेने का आदी हो सकता है। परिणामस्वरूप मौलिकता, कल्पनाशक्ति और स्वतंत्र चिंतन प्रभावित हो सकते हैं।
इस पर मनोवैज्ञानिक डॉ. रीना राजपूत का मानना है कि एआई का दखल जीवन के लगभग हर क्षेत्र में लगातार बढ़ रहा है और इसका सबसे अधिक प्रभाव बच्चों पर पड़ रहा है। उनके अनुसार पहले बच्चे अपनी जिज्ञासाओं और समस्याओं के समाधान के लिए परिवार के बड़ों, शिक्षकों और अनुभवी लोगों पर निर्भर रहते थे, जिससे संवाद और सीखने की एक स्वाभाविक प्रक्रिया विकसित होती थी। लेकिन अब जब अधिकांश प्रश्नों के उत्तर एआई के माध्यम से तुरंत उपलब्ध हो जाते हैं, तो बच्चों को बड़ों से मार्गदर्शन लेने की आवश्यकता कम महसूस होती है। इसका प्रभाव उनके व्यवहार और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ सकता है तथा बड़ों के प्रति सम्मान और संवाद में कमी देखने को मिल सकती है।
डॉ. रीना राजपूत यह भी कहती हैं कि एआई पर अत्यधिक निर्भरता हमारे मस्तिष्क की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है। जब हम स्वयं सोचने, विश्लेषण करने और समाधान खोजने के बजाय हर काम के लिए तकनीक पर निर्भर होने लगते हैं, तो मस्तिष्क का स्वाभाविक अभ्यास कम हो जाता है। इससे स्मरण शक्ति, कल्पनाशक्ति, समस्या-समाधान क्षमता और रचनात्मक सोच पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। वे कहती हैं कि ब्रेन जिम एक्सरसाइज इसे बेहतर तरीके से समझा सकता है कि किस तरह ब्रेन की कार्यक्षमता घट रही है।साथ ही इसी एक्सरसाइज के जरिए हम अपनी बौद्धिक कार्यक्षमता बढ़ा सकते हैं। इसी तरह समाजशास्त्री डॉ अर्चना खंडेलवाल का मानना है कि एआई आधारित समाज में एक बड़े तबके के पास काम नहीं होगा।यानी एआई ज्यादातर बौध्दिक कामों वाले जगहों में मानवीय बुध्दि कौशल का स्थान लेगा। इससे सामाजिक संरचना पर असर पड़ेगा। वहीं आर्थिक परिदृश्य भी प्रभावित होगा। विशेषज्ञों की राय है कि हमें एआई के इस्तेमाल की सीमाएं निर्धारित करनी होगी।तभी यह हमारे लिए सकारात्मक परिणाम देगा।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि एआई कितना बुद्धिमान हो रहा है। असली प्रश्न यह है कि सुविधा के इस युग में मनुष्य अपनी सोचने, कल्पना करने और सृजन करने की क्षमता को कितना जीवित रख पाता है। यही आने वाले समय की सबसे बड़ी बौद्धिक चुनौती होगी।
आकांक्षा तिवारी “वर्षा “, वरिष्ठ पत्रकार




