सहकारिता सप्ताह : छत्तीसगढ़ की समृद्धि का जनआंदोलन

भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सहकारिता केवल एक आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक सहभागिता, आत्मनिर्भरता और सामूहिक विकास का सशक्त माध्यम है। “सहकार से समृद्धि” का मंत्र इसी सोच को अभिव्यक्त करता है कि विकास तभी सार्थक होगा, जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। कृषि और वन संपदा से समृद्ध छत्तीसगढ़ में सहकारिता आंदोलन ने किसानों, वनवासियों, दुग्ध उत्पादकों, महिलाओं और ग्रामीण समुदायों के जीवन में उल्लेखनीय परिवर्तन लाया है। यही कारण है कि प्रदेश में 29 जून से 6 जुलाई तक मनाया जा रहा सहकारिता सप्ताह केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि सहकारी आंदोलन की उपलब्धियों, चुनौतियों और भविष्य की दिशा पर विचार का महत्वपूर्ण अवसर है।
प्रदेश में हाल ही में 515 नई प्राथमिक कृषि साख समितियों के गठन के बाद इनकी कुल संख्या 2,573 हो गई है। इन समितियों के माध्यम से किसानों को अल्पकालीन कृषि ऋण, उर्वरक, प्रमाणित बीज, कृषि यंत्र, भंडारण तथा विपणन जैसी सुविधाएँ गाँव स्तर पर उपलब्ध कराई जा रही हैं। सहकारिता सप्ताह के दौरान सदस्यता अभियान, सहकारी मेले, किसान संगोष्ठियाँ, माइक्रो एटीएम सुविधा, किसान क्रेडिट कार्ड वितरण तथा डिजिटल बैंकिंग जैसे कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जो सहकारिता को आधुनिक स्वरूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हैं।
छत्तीसगढ़ की सहकारिता व्यवस्था की सबसे बड़ी पहचान समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की सुदृढ़ प्रणाली है। राज्य देश के अग्रणी धान उत्पादक राज्यों में शामिल है और प्रत्येक वर्ष करोड़ों क्विंटल धान का उपार्जन मुख्यतः सहकारी समितियों के माध्यम से किया जाता है। यही समितियाँ किसानों और शासन के बीच सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं। धान खरीदी के साथ-साथ मक्का तथा अन्य खाद्यान्नों के विपणन में भी इनकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। इस व्यवस्था ने किसानों को उनकी उपज का समय पर मूल्य दिलाने के साथ सार्वजनिक वितरण प्रणाली को भी मजबूत आधार प्रदान किया है।
धान खरीदी व्यवस्था को प्रभावी बनाने में छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी विपणन संघ (मार्कफेड) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। मार्कफेड धान उपार्जन, कस्टम मिलिंग, उर्वरकों के वितरण, कृषि आदानों की उपलब्धता तथा भंडारण व्यवस्था का प्रमुख दायित्व निभाता है। इसके अतिरिक्त किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज उपलब्ध कराने, उर्वरकों की समयबद्ध आपूर्ति तथा कृषि विपणन को सुदृढ़ करने में भी इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। भविष्य में कृषि प्रसंस्करण, वैल्यू एडिशन और निर्यातोन्मुख कृषि उत्पादों के विकास में मार्कफेड की भूमिका और अधिक बढ़ सकती है।
वन संपदा छत्तीसगढ़ की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत है। राज्य में हजारों लघु वनोपज सहकारी समितियाँ और प्राथमिक लघु वनोपज समितियाँ लाखों वनवासी परिवारों की आजीविका का आधार बनी हुई हैं। तेंदूपत्ता संग्रहण में छत्तीसगढ़ देश के अग्रणी राज्यों में है। इसके अलावा महुआ, इमली, हर्रा, चिरौंजी, साल बीज, शहद, लाख, गिलोय तथा अन्य लघु वनोपजों का संग्रहण और विपणन सहकारी व्यवस्था के माध्यम से किया जाता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य योजना के अंतर्गत अनेक लघु वनोपजों की खरीदी ने आदिवासी परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि की है।
वनोपजों के मूल्य संवर्धन की दिशा में ‘संजीवनी’ ब्रांड छत्तीसगढ़ की एक अभिनव पहल है। इसके माध्यम से महुआ लड्डू, इमली कैंडी, प्राकृतिक शहद, मिलेट आधारित उत्पाद, हर्बल चूर्ण, औषधीय उत्पाद तथा वन आधारित खाद्य सामग्री आधुनिक पैकेजिंग के साथ बाजार में उपलब्ध कराई जा रही है। इससे स्थानीय उत्पादों को राष्ट्रीय पहचान मिली है तथा वनवासियों को संग्रहण के साथ-साथ प्रसंस्करण और विपणन से भी अतिरिक्त आय प्राप्त हो रही है। यह ‘वोकल फॉर लोकल’ और स्थानीय संसाधनों पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सफल उदाहरण है।
दुग्ध सहकारिता के क्षेत्र में देवभोग आज छत्तीसगढ़ की पहचान बन चुका है। छत्तीसगढ़ राज्य दुग्ध महासंघ के माध्यम से संचालित इस ब्रांड से हजारों दुग्ध उत्पादक किसान जुड़े हुए हैं। प्रदेश के अनेक जिलों में दुग्ध संग्रहण केन्द्रों का विस्तार हुआ है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में दूध का वैज्ञानिक संग्रहण और विपणन संभव हुआ है। देवभोग के माध्यम से दूध, दही, घी, पनीर, छाछ, लस्सी तथा अन्य दुग्ध उत्पादों की बिक्री लगातार बढ़ रही है। विशेष रूप से महिला दुग्ध समितियों की भागीदारी ने डेयरी सहकारिता को महिला आर्थिक सशक्तीकरण का प्रभावी माध्यम बनाया है।
ग्रामीण वित्तीय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में छत्तीसगढ़ राज्य सहकारी बैंक (अपेक्स बैंक) तथा जिला सहकारी केंद्रीय बैंक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। फसल ऋण, किसान क्रेडिट कार्ड, ब्याज अनुदान, डिजिटल बैंकिंग, माइक्रो एटीएम तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी व्यवस्थाओं ने ग्रामीण बैंकिंग को नई दिशा दी है। पैक्स समितियों के कंप्यूटरीकरण से सेवा वितरण में पारदर्शिता और गति दोनों बढ़ी हैं।
छत्तीसगढ़ में सहकारिता का विस्तार अब केवल कृषि तक सीमित नहीं है। मत्स्य, बुनकर, डेयरी, महिला स्व-सहायता समूह, ग्रामीण उद्योग, जैविक खेती तथा कृषि उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को भी सहकारी ढाँचे से जोड़ा जा रहा है। इससे रोजगार के नए अवसर विकसित हो रहे हैं और ग्रामीण अर्थव्यवस्था अधिक विविध एवं आत्मनिर्भर बन रही है।
हालाँकि अनेक उपलब्धियों के बावजूद चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। कई सहकारी समितियों में पेशेवर प्रबंधन, समयबद्ध अंकेक्षण, डिजिटलीकरण, भंडारण क्षमता, विपणन दक्षता तथा युवा नेतृत्व को और सशक्त बनाने की आवश्यकता है। कृषि प्रसंस्करण, कोल्ड चेन, ई-कॉमर्स, निर्यात, प्राकृतिक खेती और मूल्य संवर्धन जैसे क्षेत्रों में सहकारिता की भूमिका बढ़ाकर किसानों और वनवासियों की आय में और वृद्धि की जा सकती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सहकारिता को केवल सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन का माध्यम न मानकर जनभागीदारी के व्यापक आंदोलन के रूप में विकसित किया जाए। छत्तीसगढ़ ने धान उपार्जन, लघु वनोपज, डेयरी, ग्रामीण बैंकिंग और सहकारी संस्थाओं के विस्तार के माध्यम से एक मजबूत आधार तैयार किया है। यदि आधुनिक तकनीक, नवाचार, पारदर्शिता और युवा नेतृत्व के साथ इस आधार को और सुदृढ़ किया जाए, तो सहकारिता आत्मनिर्भर, समृद्ध और समावेशी छत्तीसगढ़ के निर्माण की सबसे प्रभावी शक्ति सिद्ध होगी। सहकारिता सप्ताह का वास्तविक संदेश भी यही है कि साझी भागीदारी से ही साझा समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।
आकांक्षा तिवारी “वर्षा “




