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लुप्त होती राज सहायता के मायने

भारत में रहने वाले आर्थिक रूप से कमजोर लोग सावधान हो जाएँ.उन्हें मिलने वाली राज सहायता यानि ‘सब्सिडी’ अब शायद ही मिल पाए. सरकार को अब इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि आप महंगाई के बोझ से जी रहे हैं या मर रहे हैं. हाल ही में सरकार ने एक तरफ रसोई गैस की कीमत फिर से 15 रुपया सिलेंडर बढ़ा दी है,वहीं गैस सिलेंडर पर मिलने वाली राज सहायता यनि सब्सिडी बंद कर दी है.

लोक कल्याणकारी राज में आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को राज सहायता देने की व्यवस्था आज की नहीं है. लेकिन आज इसे समाप्त करने का दुस्साहस सरकार ने कर दिखाया है. सब्सिडी का अर्थ होता है, सरकार द्वारा मिलने वाली आर्थिक मदद। के सरकार किसी संस्था , व्यवसाय को भी सब्सिडी देती है ताकि आम आदमी पर आर्थिक बोझ कम पड़े. यह सब्सिडी आमतौर पर किसी व्यक्ति को कर या फिर कर कटौती के रूप में दी जाती है। हमारे देश में राज सहायता का लाभ लघु उद्योंगों से लेकर किसानों और आम आदमी तक को हासिल थी. किसान को खाद-बीज पर तो आम आदमी को गृह ऋण से लेकर रसोई गैस पर राज सहायता दी जा रही थी.

देश में केंद्र और राज्य की सरकारें उत्पादन,रोजगार,परिवहन, ऋण, कर और धार्मिक यात्राओं तक के लिए राज सहायता देती आयी है लेकिन बीते सात साल में एक-एक कर तमाम राजसहायता या तो कम कर दी गयी या उसे बंद कर दिया गया. भारतीय रेल ने तो इस राज सहायता को एकदम से बंद कर दिया. वरना महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों, विकलांगों, कैंसर के मरीजों,अधिमान्य पत्रकारों और उसके सहायकों तक को राज सहायता प्राप्त थी. अब केवल विधायक और सांसद इसका आनंद ले रहे हैं.

राज सहायता देने के पीछे पहले वास्तविक धरातल को प्राथमिकता दी जाती थी.बाद में इसका इस्तेमाल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाना लगा .राज सहायता देने में ऐसी व्यवस्थाएं की गयीं की इसका लाभ आम और गरीब आदमी के साथ-साथ अमीर आदमी भी लेने लगे. आप कह सकते हैं की राज सहायता का दुरूपयोग भी होने लगा. राज सहायता आम आदमी का अधिकार तो नहीं है लेकिन लोक कल्याणकारी राज्य में इसके बिना आगे भी नहीं बढ़ा जा सकता, वो भी भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में जहाँ आम आदमी की दैनिक आमदनी दो जून रोटी की जुगाड़ करने लायक भी नहीं है.

‘सबका साथ,सबका विकास’ और ”अच्छे दिनों का सपना दिखने वाली मौजूदा सरकार पिछले सात साल से राज सहायता की राशि में लगातार कटौती कर रही है, क्योंकि सरकार को लगता है कि अब देश की जनता को कल्याण की जरूरत नहीं है. जनता का जितना कल्याण होना था उतना पांच-छह दशक में कांग्रेस कर चुकी है. अब देश के कल्याण की जरूरत है. इसलिए एक तरफ मंहगाई बेलगाम है और दूसरी तरफ राज सहायता लगभग शून्य की जा रही है. हाल ही में रसोई गैस पर दी जाने वाली सब्सिडी को भी बंद कर दिया गया. इसकी आशंका उसी दिन हो गयी थी जब सरकार ने उपभोक्ता को सीधे बैंक में राज सहायता जमा करने का नाटक किया था.

केंद्र सरकार सब्सिडी के खर्च को कम करने में लगातार कोशिश करती दिख रही है. वित्त वर्ष 2020-21 में उर्वरक, खाद्य और पेट्रोलियम को मिलाकर कुल सब्सिडी व्यय 227,794 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. यह 2019-20 के बजटीय अनुमान 301,694 करोड़ रुपये से करीब 80,000 करोड़ रुपये कम है. हालांकि चालू वित्त वर्ष के संशोधित अनुमान 227,255 से यह 539 करोड़ रुपये ज्यादा है.

आम आदमी बजट के दस्तावेज पढता नहीं ,लेकिन इन्हीं बजट दस्तावेजों के मुताबिक 2020-21 में उर्वरक सब्सिडी 71,309 करोड़ रुपये, खाद्य सब्सिडी 1,15,570 करोड़ रुपये और पेट्रोलियम सब्सिडी 40,915 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है. वहीं संशोधित बजट अनुमानों के मुताबिक चालू वित्त वर्ष में उर्वरक सब्सिडी खर्च 79,998, खाद्य सब्सिडी 108,688 और पेट्रोलियम सब्सिडी खर्च 38,569 करोड़ रुपये रहेगा. वित्त वर्ष 2018-19 में केंद्र का सब्सिडी पर खर्च 196,769 करोड़ रुपये था. सरकार का ब्याज मद में खर्च बढ़कर 2020-21 में बढ़कर 7,08,203 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जबकि 2019-20 के संशोधित अनुमान में यह 6,25,105 लाख करोड़ रुपये आंका गया है. बजट दस्तावेज के मुताबिक सरकार का पेंशन मद में खर्च 2020-21 में 2,10,682 करोड़ रुपये रहने का अनुमान है जो 2019-20 के संशोधित अनुमान में 1,84,147 करोड़ रुपये था.

हकीकत ये है की अब राज सहायता यानि सब्सिडी आम आदमी के कल्याण का हथियार नहीं बल्कि सरकार के लिए वोट कबाड़ने का हथियार बन गया है. एक साल से आंदोलन कर रहे किसान भी इसी हथियार से काटे जा रहे हैं. सरकार के मंत्री इसके फायदे को अपने सोशल मीडिया पेज पर शेयर कर रहे हैं. भाजपा नेता भी सब्सिडी में वृद्धि करके किसानों को राहत देने के निर्णय को ऐतिहासिक बता रहे हैं. हालांकि, वो यह नहीं बता रहे हैं कि 2022 तक किसानों की आय, दोगुनी करने के वादे की गाड़ी कहां तक पहुंची है.

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने अपने फेसबुक पेज पर लिखा है कि अंतरराष्ट्रीय कीमत बढ़ने और आयात निर्भरता होने की वजह से डीएपी (डाई अमोनियम फास्फेट) की प्रति बोरी (50 किलो) कीमत 1711 रुपए से बढ़कर 2411 रूपए हो गई थी. यदि पहले की तरह 511 रुपये बोरी ही सब्सिडी रहती तो किसानों को 1200 रुपये प्रति बोरी की जगह 1900 का भुगतान करना पड़ता. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों के हित को देखते हुए सब्सिडी को 511 से बढ़ाकर 1211 रुपये कर दिया. ताकि अंतरराष्ट्रीय दाम बढ़ने के बावजूद किसानों पर कोई भार न पड़े.

भारत में हज सब्सिडी लगभग 650 करोड़ रुपये है. ये आमतौर पर सऊदी अरब जाने के लिए हवाई किराये के रूप में दी जाती हैं. मुसलमानों का यही मानना है कि सब्सिडी उन्हें नहीं बल्कि हवाई कंपनियों को मिलती है. इस राज सहायता को सरकार ही नहीं देश की अदालत भी बंद करना चाहती है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने हज यात्रियों को सरकार से मिलने वाली आर्थिक मदद की नीति पर एतराज जताया है। उसने अगले 10 साल में धीरे-धीरे हज सब्सिडी खत्म करने का आदेश दिया है। जस्टिस आफताब आलम और रंजना प्रकाश देसाई की बेंच ने यह आदेश जारी किया था.

राज सहायता के बिना आम आदमी जियेगा या महंगाई की डाईन उसे खा जाएगी ये कहना सरकार विरोधी बात करना होगा,लेकिन हकीकत ये है कि पिछले एक साल में रसोई गैस 305.50 रुपये तक महंगा हो चुका है। इस वर्ष 1 सितंबर को 14.2 किलोग्राम के गैर-सब्सिडी रसोई गेस सिलेंडर के दाम में 25 रुपये की बढ़ोतरी की गई थी। इससे पहले 17 अगस्त को गैस सिलेंडर की कीमतों में 25 रुपये का इजाफा हुआ था। और अब 15 रूपये फिर बढ़ा दिए गए हैं, तर्क वही पुराना और घिसा-पिटा की अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सब कुछ महंगा हो रहा है.अब ये आपके ऊपर है की आप सरकार से राज सहायता मांगे या नहीं. मर्जी है आपकी क्योंकि सरकार है आपकी. प्रधानमंत्री हैं आपके. @ राकेश अचल

 

 

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