#प्रदेश

पंचतत्व में विलीन हुईं पंडवानी की अमर आवाज़: राजकीय सम्मान के साथ डॉ. तीजन बाई को अंतिम विदाई, नम आंखों से उमड़ा जनसैलाब

Advertisement Carousel

दुर्ग। छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को विश्वभर में नई पहचान दिलाने वाली विश्वविख्यात पंडवानी गायिका और पद्म विभूषण डॉ. तीजन बाई को रविवार को उनके पैतृक गांव गनियारी में पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई। जैसे ही उनकी अंतिम यात्रा गांव पहुंची, हजारों लोगों की आंखें नम हो गईं। प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, कलाकारों, साहित्यकारों और बड़ी संख्या में ग्रामीणों ने लोककला की इस महान साधिका को अंतिम प्रणाम किया।

राज्य शासन के निर्देशानुसार पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार की सभी औपचारिकताएं पूरी की गईं। गनियारी की मिट्टी ने अपनी उस बेटी को अंतिम विदाई दी, जिसने अपनी आवाज़ से छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को दुनिया के सबसे बड़े मंचों तक पहुंचाया।

डॉ. तीजन बाई ने पंडवानी की कापालिक शैली को अपनी ओजस्वी प्रस्तुति और प्रभावशाली अभिनय से ऐसी पहचान दिलाई कि महाभारत की कथाएं देश ही नहीं, बल्कि एशिया, यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया तक गूंज उठीं। उनका संघर्ष, साधना और समर्पण ग्रामीण परिवेश से निकलकर विश्व मंच तक पहुंचने की प्रेरणादायक कहानी बन गया।

भारतीय लोककला में उनके अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री, पद्म भूषण और देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण सहित अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया। उन्होंने अपनी कला के माध्यम से छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता को वैश्विक पहचान दिलाई।

डॉ. तीजन बाई के निधन को भारतीय लोककला के एक स्वर्णिम अध्याय का अंत माना जा रहा है। हालांकि उनकी स्वर-साधना, पंडवानी की समृद्ध परंपरा और लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए किया गया आजीवन योगदान हमेशा अमर रहेगा। गनियारी में उमड़ा जनसैलाब इस बात का साक्षी बना कि कलाकार भले ही विदा हो जाए, लेकिन उसकी कला कभी नहीं मरती।