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खाने के तेल के दामों में 5 से 20 रुपये किलो की हुई कटौती, सरकार ने किया दावा

रिटेल मार्केट में खाने के तेल के दामों में 5 से 20 रुपये प्रति किलो की कमी आई है. अडानी विल्मर और रुचि सोया ने जैसे बड़ी कंपनियों ने दामों में 15 से 20 रुपये प्रति किलो की कमी की है जिसके चलते खाने के तेल के दामों में कमी आई है. जिन अन्य कंपनियों ने खाद्य तेलों की कीमतों में कमी की है, वे हैं जेमिनी एडिबल्स एंड फैट्स इंडिया, हैदराबाद, मोदी नैचुरल्स, दिल्ली, गोकुल री-फॉयल एंड सॉल्वेंट, विजय सॉल्वेक्स, गोकुल एग्रो रिसोर्सेज और एन के प्रोटीन्स. उपभोक्ता मामलें के मंत्रालय ने दावा किया है.

सरकार का दावा घट रहे दाम

सरकार ने कहा है कि देशभर में खाद्य तेलों की खुदरा कीमतें एक साल के पहले तुलना में ऊंची हैं लेकिन अक्टूबर, 2021 के बाद से इनमें गिरावट का रुझान है. 167 मूल्य संग्रह केंद्रों के रुझान के अनुसार, देशभर के प्रमुख खुदरा बाजारों में खाद्य तेलों की खुदरा कीमतों में 5-20 रुपये प्रति किलोग्राम की भारी गिरावट आई है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, मंगलवार को मूंगफली तेल का अखिल भारतीय औसत खुदरा मूल्य 180 रुपये प्रति किलो, सरसों तेल का 184.59 रुपये प्रति किलो, सोया तेल का 148.85 रुपये प्रति किलो, सूरजमुखी तेल का 162.4 रुपये प्रति किलो और पाम तेल का 128.5 रुपये प्रति किलो था.

दाम घटाने के लिए सरकार के कदम  

सरकार ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतें अधिक होने के बावजूद केंद्र और राज्य सरकारों के हस्तक्षेप से खाद्य तेलों की कीमतों में कमी आई है. खाद्य तेल की कीमतें एक साल पहले की अवधि की तुलना में अधिक हैं लेकिन अक्टूबर से ये नीचे आ रही हैं. आयात शुल्क में कमी और जमाखोरी पर लगाम लगाने, स्टॉक की सीमा लगाने जैसे अन्य कदमों से सभी खाद्य तेलों की घरेलू कीमतों में कमी लाने में मदद मिली है जिससे उपभोक्ताओं को राहत मिली है. खाद्य तेलों के आयात पर भारी निर्भरता के कारण घरेलू उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयास करना महत्वपूर्ण है।

खपत के लिए आयात पर निर्भर

भारत खाद्य तेलों के सबसे बड़े आयातकों में से एक है क्योंकि इसका घरेलू उत्पादन इसकी घरेलू मांग को पूरा करने में असमर्थ है.  देश में खाद्य तेलों की खपत का लगभग 56-60 प्रतिशत आयात के माध्यम से पूरा किया जाता है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय के मुताबिक वैश्विक उत्पादन में कमी और निर्यातक देशों द्वारा निर्यात कर में वृद्धि के कारण खाद्य तेलों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें दबाव में हैं. देश में खाद्य तेलों की कीमतें आयातित तेलों की कीमतों के आधार पर तय की जाती है.

 

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