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छत्तीसगढ़ के बदलते राजनीतिक समीकरण: कही-सुनी – रवि भोई (04 JUNE-23)

रवि भोई की कलम से


छत्तीसगढ़ के बदलते राजनीतिक समीकरण

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत की बढ़ती निकटता को छत्तीसगढ़ के बदलते राजनीतिक समीकरण के रूप में देखा जा रहा है। पिछले कुछ महीनों में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और विधानसभा अध्यक्ष चरणदास महंत कई कार्यक्रमों में साथ-साथ नजर आए। कहते हैं 20 मई को पाटन में आयोजित भरोसे के सम्मेलन में चरणदास महंत ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की खूब तारीफ़ भी की। इसके अलावा कोरबा और बस्तर के कुछ कार्यक्रमों में भी भूपेश बघेल और चरणदास महंत एक मंच पर नजर आए। 2 जून की रात मंत्री मोहम्मद अकबर के बंगले पर आयोजित दावत में मुख्यमंत्री के साथ विधानसभा अध्यक्ष की मौजूदगी को नए राजनीतिक नजरिए से देखा जा रहा है। 2018 में मुख्यमंत्री की दौड़ में शामिल चरणदास महंत भले भूपेश बघेल से पीछे रह गए, पर दोनों ने सुर-ताल बिगड़ने नहीं दिया। कहा जाता है कि प्रदेश अध्यक्ष रहते महंत ने 2013 में भूपेश बघेल को समन्वय समिति का अध्यक्ष बनवाया था। फिर महंत ने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छोड़ी तो भूपेश बघेल उनके उत्तराधिकारी बने।

भाजपा के दिग्गज दरकिनार

प्रदेश भाजपा ने 11 लोकसभा और 90 विधानसभा क्षेत्रों में 30 मई से 30 जून तक आयोजित होने वाले कार्यक्रमों के लिए किसी दिग्गज नेता को कोई जिम्मेदारी नहीं सौंपी है। 2003 से 2018 तक पावर में रहने वालों के नाम भी नदारद हैं। चुनावी साल में मोदी सरकार की उपलब्धियों के गुणगान वाले कार्यक्रमों में राज्य के बड़े नेताओं को दूर रखने के अलग-अलग मायने लगाए जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि 2023 के चुनाव में बड़े चेहरे गायब होने का यह संकेत हैं या फिर छत्तीसगढ़ में मार्गदर्शक मंडल बनाने की तैयारी है। एक महीने के कार्यक्रम में न तो डॉ रमन सिंह को आगे किया गया है और न ही बृजमोहन अग्रवाल को। राज्यसभा सांसद सुश्री सरोज पांडे भी पूरे एपिसोड से गायब हैं। प्रदेश अध्यक्ष रहे विष्णु देव साय और विक्रम उसेंडी को भी दूर रखा गया है। आदिवासी नेता रामविचार नेताम और ननकीराम कंवर भी कार्यक्रम के हिस्सा नहीं हैं। सालों तक प्रदेश भाजपा का कोष संभालने और भरने वाले गौरीशंकर अग्रवाल का भी नाम नहीं है, सक्रिय विधायक अजय चंद्राकर को भी कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई है। वहीं बसपा से भाजपा में आए नेता और विधायक सौरभ सिंह को आयोजन में बड़ी जिम्मेदारी देने से पार्टी का एक वर्ग खफा हो गया है।

ठौर की तलाश में अमित जोगी

सिर से पिता का साया उठने के बाद पुत्र के सामने चुनौतियों का पहाड़ खड़ा हो जाता है, ऐसा ही कुछ इन दिनों अमित जोगी के साथ दिखाई पड़ रहा है। छत्तीसगढ़ के प्रथम मुख्यमंत्री स्व. अजीत जोगी के पुत्र और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस (जोगी) के नेता अमित जोगी के लिए आगे की राह भारी उबड़-खाबड़ हो गई है। रायपुर के कलेक्टर से लेकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री तक अजीत जोगी का अपना एक अलग प्रभाव था, पर अमित के साथ ऐसा नहीं है। अमित की विधायक मां डॉ. रेणु जोगी भी अस्वस्थ रहने लगी हैं। जोगी कांग्रेस के शुरूआती दिनों में आधार स्तंभ रहे विधायक धर्मजीत सिंह पार्टी से निलंबित हैं। एक अन्य विधायक प्रमोद शर्मा भी दरकिनार हैं। अमित जोगी ने अपने और अपनी पार्टी की आगे की राह के लिए जनता से राय मांगी है। अब देखते हैं जनता क्या राय देती है और अमित क्या फैसला लेते हैं। फिलहाल तो लग रहा है कि अमित जोगी भटकाव के दौर से गुजर रहे हैं। कहते हैं तेलंगाना के मुख्यमंत्री और भारत राष्ट्र समिति के प्रमुख के. चंद्रशेखर राव से मुलाक़ात कर अमित जोगी ने आगे की संभावना को तलाशा। चर्चा है कि अमित जोगी आम आदमी पार्टी से भी संपर्क कर चुके हैं। अमित जोगी के कांग्रेस और भाजपा में जाने की ख़बरें भी उड़ती रहती है। कहा जा रहा है कि अमित 2023 के विधानसभा चुनाव के लिए तीसरा मोर्चा बनाने पर भी काम कर रहे हैं।

विधायक जी की ‘बकरा पार्टी ‘

छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव को अब करीब छह महीने बचे हैं। विधायक और विधायक के दावेदार लोग अभी से वाल पेंटिंग शुरू करवा दिया है। ऐसा करने वाले भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों से जुड़े लोग है। अब वाल पेंटिंग कराने वालों को पार्टी उम्मीदवार बनाती है या नहीं यह अलग बात है। कहते हैं राज्य के एक विधायक ने 2023 में जीत के लिए पिछले दिनों अपने विधानसभा में ‘बकरा पार्टी ‘ दी। 2018 में पहली बार विधायकी का ताज पहने नेताजी को ताज ऐसा भा गया है कि अब वे उसे उतारना नहीं चाहते। इसके लिए उन्होंने लोगों को दावतें देना शुरू कर दिया। पर विधायक जी की दावत से लौट रहे एक जनप्रतिनिधि की दुर्घटना में मौत के कारण लोगों का उत्साह गम में बदल गया।

भाजपा के वोट बैंक पर सेंध की रणनीति

राम वन गमन, कौशल्या धाम के बाद अब सरकारी स्तर पर रामायण के आयोजन की तैयारी को भाजपा के वोट बैंक पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की सेंध की रणनीति के तौर देखा जा रहा है। गाय , गोबर और गोमूत्र से लेकर राज्य में भगवान श्रीराम से जुड़े प्रसंगों से जनता को जोड़कर भूपेश बघेल ने भाजपा के मुद्दों को छीनने में लग गए हैं। भूपेश बघेल की चाल का कांग्रेस को 2023 के चुनाव में कितना फायदा मिलता है, यह तो समय बताएगा, पर लोगों को रामायण जैसे आयोजनों से नया अनुभव हो रहा है और देखने के लिए भीड़ उमड़ रही है। कहते हैं रायगढ़ के आयोजन में भारी मारामारी रही। ग्राउंड ही छोटा पड़ गया।

बम नहीं फोड़ पाई भाजपा

महीनों की मेहनत के बाद भाजपा ने पिछले दिनों चार सौ से अधिक लोगों को पार्टी में प्रवेश कराया ,लेकिन कोई दमदार नेता कांग्रेस से टूटकर भाजपा में नहीं आया। रिटायर्ड आईएएस अधिकारी आरपीएस त्यागी कांग्रेस छोड़कर भाजपा तो आए , पर वे जनाधार वाले नेता नहीं हैं। पद्मश्री अनुज शर्मा और राधेश्याम बारले कलाकार हैं। कहा जा रहा है कलाकार भीड़ जुटा सकते हैं,पर उसे वोट में तब्दील कर पाएंगे, इसकी संभावना कम है। नंदकुमार साय प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा नाम है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने साय को कांग्रेस में शामिल कराकर भाजपा को जो झटका दिया है, वह इस अभियान से तो बराबर नहीं हुआ।

वर्दी की गर्मी

वर्दी की गर्मी ही ऐसी है कि उसमें उबाल आ ही जाता है। भले समय और अनुभव के साथ वर्दी की गर्मी कम हो जाती। वर्दी की गर्मी की वजह से रायगढ़ के रामायण महोत्सव में एक नए नवेले आईपीएस ने नौजवान पत्रकार को पुलिसिया रौब दिखा दिया। फिर क्या था 45 डिग्री से अधिक तापमान का रिकार्ड बनाने वाले रायगढ़ शहर में पत्रकारों का पारा चढ़ गया। कलेक्टर और एसपी ने मामला शांत किया। कहते हैं प्रशिक्षु आईपीएस ने पत्रकारों को सॉरी भी कहा। प्रशिक्षु आईपीएस को वहां की ड्यूटी से भी हटा दिया, पर सवाल उठता है कि नए नवेले आईपीएस उबल क्यों पड़ते हैं। कुछ महीने रायपुर में भी एक नए आईपीएस ने भाजयुमो के नेता से अभद्रता कर दी थी। बाद में उन्हें भी माफ़ी मांगनी पड़ी थी। नए अफसरों को समझना होगा वे आम नहीं खास हो गए हैं , ऐसे में उनके आचार-व्यवहार और बोली में भी खास का अहसास होना चाहिए। केवल वर्दी की गर्मी से मान नहीं बढ़ेगा। मान तो दूसरों को सम्मान देने से बढ़ेगा।


(लेखक स्वतंत्र पत्रकार और पत्रिका समवेत सृजन के प्रबंध संपादक हैं।)

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