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सीएम साय के गृह जिले की ₹9.84 करोड़ की सिंचाई परियोजना पर हाईकोर्ट सख्त, जल संसाधन विभाग के 4 अफसरों को नोटिस

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० लोअर डोड़की डायवर्जन स्कीम के टेंडर पर उठे सवाल; 5 दिन में मांगा जवाब, हाईकोर्ट की ₹1 लाख लागत वेतन से वसूले जाने की भी प्रक्रिया शुरू

रायपुर। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गृह जिले जशपुर की लोअर डोड़की डायवर्जन स्कीम के करीब 9.84 करोड़ रुपये के टेंडर को लेकर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद जल संसाधन विभाग में हलचल मच गई है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद विभाग ने अपने ही चार वरिष्ठ अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पांच दिन के भीतर जवाब मांगा है। साथ ही न्यायालय द्वारा लगाए गए ₹1 लाख की लागत की राशि संबंधित अधिकारियों के वेतन से वसूलने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है।

मामला Tender No. 183610 से जुड़ा है, जिसके तहत जशपुर जिले की लोअर डोड़की डायवर्जन स्कीम में गेट मरम्मत और लाइनिंग का कार्य प्रस्तावित था। यह परियोजना क्षेत्र के किसानों को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने वाली महत्वपूर्ण योजना मानी जाती है। वर्तमान में जल संसाधन विभाग का प्रभार स्वयं मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास होने से यह मामला और अधिक चर्चा में आ गया है।

टेंडर प्रक्रिया पर हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणी

विवाद उस समय शुरू हुआ जब एम/एस आर्य कंस्ट्रक्शन कंपनी को तकनीकी रूप से अयोग्य घोषित किए जाने के बाद वित्तीय बोली की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए मामला हाईकोर्ट पहुंचा। WPC No. 2322/2026 में सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने 11 मई 2026 के आदेश में निविदा प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने प्रक्रिया में कथित मनमानी और संविधान के अनुच्छेद-14 के तहत समानता के सिद्धांत से जुड़े मुद्दों का उल्लेख करते हुए याचिकाकर्ता के पक्ष में ₹1 लाख की लागत देने का आदेश दिया।

चार अधिकारियों से स्पष्टीकरण तलब

हाईकोर्ट के आदेश के बाद जल संसाधन विभाग ने मुख्य अभियंता (निविदा प्रकोष्ठ) के.एस. गुरुवर, वित्त नियंत्रक रुद्र प्रताप सिंह चौहान, कार्यपालन अभियंता अरविंद कुमार कोशले और वरिष्ठ लेखा अधिकारी बालचंद शेखर मिश्रा को कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

विभाग का कहना है कि प्रथम दृष्टया निविदा प्रक्रिया में तथ्यों की अनदेखी, निर्धारित दायित्वों के विपरीत कार्य और नियमों के उल्लंघन जैसी स्थितियां सामने आई हैं। अधिकारियों से पूछा गया है कि उनके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई क्यों न की जाए और हाईकोर्ट द्वारा लगाई गई ₹1 लाख की लागत उनके वेतन से क्यों न वसूली जाए।

5 दिन में जवाब, नहीं तो एकपक्षीय कार्रवाई

विभाग ने सभी अधिकारियों को पांच दिन के भीतर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है। यदि तय समय में जवाब नहीं मिलता है तो विभाग ने एकपक्षीय कार्रवाई की चेतावनी भी दी है।

मुख्यमंत्री के गृह जिले से जुड़ी इस परियोजना और हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणियों के बाद विभाग की यह कार्रवाई प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। अब सबकी नजर चारों अधिकारियों के जवाब और विभाग के अगले कदम पर टिकी है।